बस कंडक्टर मेरा क्रश था, एक दिन बस में ही चुद गई पार्ट 1 - देसी हिंदी सेक्स स्टोरी Hindi Sex Stories
हाय, मेरा नाम नेहा है। मैं लखनऊ में रहती हूं और एक प्राइवेट कॉलेज में बी.कॉम फाइनल ईयर कर रही हूं। उम्र 19 साल, फिगर 34-26-36, गोरी-चिट्टी, लंबे बाल और कॉलेज में लड़के मेरे पीछे पागल रहते हैं। लेकिन मेरा दिल किसी और पर आ गया था – बस कंडक्टर राजू भैया पर।
राजू भैया उम्र में 28-29 के लगते थे, लंबे-चौड़े, काले रंग के लेकिन बहुत मर्दाना चेहरा। उनकी आवाज गहरी थी, मुस्कान में कुछ ऐसा था कि मेरी सांसें रुक जातीं। रोज सुबह 7 बजे घर से निकलती, बस में चढ़ती और वो टिकट काटने आते। बस हमेशा भीड़ वाली होती, लेकिन वो मुझे देखकर मुस्कुराते और कहते –
"नेहा जी, आज भी आईं? आओ, आगे आ जाओ, भीड़ में दब न जाओ।"
मैं शरमाकर मुस्कुराती और उनके पास खड़ी हो जाती।
धीरे-धीरे उनकी हरकतें बढ़ गईं। भीड़ में वो मेरी कमर पर हाथ रख देते, कभी जांघ पर हल्का सा दबाव डाल देते। मैं डरती भी थी और अजीब सा मजा भी आता। मन में सोचती – राजू भैया मुझे पसंद करते हैं क्या?
रात को बिस्तर पर लेटकर उनके बारे में सोचती, हाथ नीचे चला जाता और खुद को छूती। पहली बार किसी लड़के पर इतना क्रश हुआ था। मैं सोचती – काश वो मुझे छूए, काश वो मुझे अपना बना ले।
एक दिन सुबह तेज बारिश हो रही थी। बस में सिर्फ 4-5 लोग थे। मैं पीछे की आखिरी सीट पर बैठ गई। राजू भैया टिकट काटते-काटते मेरे पास आ गए और बगल में बैठ गए। बोले –
"नेहा जी, आज बारिश में भीग गई हो? ठंड तो नहीं लग रही?"
मैंने शरमाकर कहा –
"थोड़ी सी लग रही है।"
उन्होंने अपनी जैकेट उतारकर मेरे कंधे पर डाल दी। जैकेट के नीचे उनका हाथ धीरे से मेरी जांघ पर आ गया।
मैं सिहर गई लेकिन हटाई नहीं।
उन्होंने धीरे से कहा –
"नेहा, तुम्हें पता है ना, मैं रोज तुम्हें देखता हूं। तुम बहुत प्यारी हो।"
मेरा दिल धड़कने लगा। मैंने कहा –
"भैया... कोई देख लेगा।"
वो हंसे –
"कोई नहीं है, बस खाली है। ड्राइवर आगे है, वो नहीं देखेगा।"
फिर उन्होंने मेरी सलवार का नाड़ा खोल दिया। मैं डर रही थी लेकिन रोक नहीं पाई। उनका हाथ अंदर गया, मेरी चूत पर रगड़ा। मैं पहले से गीली थी। वो बोले –
"वाह नेहा, तुम तो पहले से तर हो रही हो... क्या मेरे बारे में सोचती हो?"
मैंने शरमाकर सिर हिलाया –
"हां भैया... बहुत दिनों से आपको पसंद करती हूं।"
ये सुनकर वो और गर्म हो गए। उन्होंने अपना लंड निकाला – मोटा, काला, नसें फूली हुईं, देखकर मेरी सांस रुक गई। वो बोले –
"अब तुम्हारी बारी है, छूओ इसे।"
मैंने पहली बार किसी लड़के का लंड पकड़ा। गर्म था, सख्त था। मैंने हल्का सा हिलाया तो वो कराहे। फिर उन्होंने मुझे अपनी गोद में बिठा लिया, सलवार नीचे सरकाई और मेरी टांगें फैलाईं। बस चल रही थी, बाहर बारिश की आवाज आ रही थी।
उन्होंने अपना लंड मेरी चूत पर रगड़ा। मैंने आंखें बंद कर लीं। एक धक्के में पूरा लंड अंदर घुस गया।
"आह्ह्ह... भैया... दर्द हो रहा है..."
मैं चीखी लेकिन उन्होंने मुंह दबा दिया। बोले –
"शांत रहो मेरी जान, पहले दर्द होगा फिर मजा आएगा।"
धीरे-धीरे धक्के मारने लगे। दर्द कम हुआ, मजा आने लगा। मैं उनकी गर्दन में मुंह छुपाकर मोन करने लगी –
"आह... भैया... और जोर से... मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।"
वो तेज-तेज पेलने लगे। भच्च-भच्च की आवाज बस में गूंज रही थी। मैंने अपनी कमीज ऊपर की, ब्रा हटाई और चुचियां दबाने लगी। वो मेरे चुचियों को चूसने लगे। कुछ मिनट बाद मैं झड़ गई – पूरा पानी निकल गया, चूत कांप रही थी। वो बोले –
"अब मेरी बारी!"
तेज धक्के मारे और मेरी चूत में ही झड़ गए। गर्म-गर्म वीर्य अंदर महसूस हुआ। मैं थककर उनकी छाती पर लेट गई।
फिर उन्होंने मेरी सलवार ठीक की, जैकेट वापस ली और बोले –
"कल फिर आएगी ना? अब तुम मेरी हो।"
मैंने शरमाकर कहा –
"हां भैया... रोज आऊंगी।"
उस दिन के बाद मेरी जिंदगी बदल गई। रोज बस में यही होता – कभी पीछे की सीट पर चुदाई, कभी खड़ी होकर भीड़ में लंड अंदर। एक दिन उन्होंने मेरी गांड भी मारी – वैसलीन लगाकर धीरे से। दर्द हुआ लेकिन मजा दोगुना हो गया।
अब मैं कॉलेज नहीं, राजू भैया के लंड के लिए बस में चढ़ती हूं। मेरा क्रश अब मेरा लवर बन चुका है।
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नेहा
कहानीकार