पहला प्यार

कॉफी शॉप में पहली मुलाकात से चुदाई तक Hindi Sex Stories

by आरुषि12 नवंबर 20247 मिनट0 views0 Comments

मेरा नाम आरुषि है। मैं दिल्ली की एक छोटी सी कॉफी शॉप में अक्सर जाती हूं – जहां शांति मिलती है, अच्छी कॉफी मिलती है और किताब पढ़ने का बहाना बन जाता है। उस दिन भी मैं अपनी फेवरेट किताब – रवींद्रनाथ टैगोर की "गीतांजलि" – पढ़ रही थी। बाहर बारिश हो रही थी, कॉफी शॉप में हल्की रोशनी और कॉफी की खुशबू।

तभी वो आया। लंबा, गोरा, अच्छे कपड़े पहने, लेकिन आंखों में कुछ ऐसा था कि दिल धड़क गया। वो मेरी टेबल पर रुका और मुस्कुराकर बोला –

"Excuse me, क्या मैं यहां बैठ सकता हूं? बाहर भीड़ है और यहां जगह खाली है।"

मैंने किताब से नजरें उठाईं। उसकी आंखें मेरी आंखों में टकराईं और जैसे समय थम गया।

"हां, बिल्कुल," मैंने धीरे से कहा।

वो बैठ गया।

पहले कुछ मिनट खामोशी रही। फिर उसने मेरी किताब देखी।

"तुम भी टैगोर पढ़ती हो? गीतांजलि... मेरी सबसे फेवरेट है।"

उसकी आवाज में गहराई थी।

"हां, मेरे लिए स्पेशल है," मैंने मुस्कुराकर कहा।

बस फिर क्या था। बातें शुरू हुईं – किताबों से, कविताओं से, जिंदगी के सपनों से। उसका नाम आरव था। वो एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर था, लेकिन दिल का बहुत रोमांटिक। घंटों हम बातें करते रहे। कॉफी खत्म हो गई, लेकिन हम उठे नहीं।

बारिश थमी तो वो बोला –

"आरुषि, अगर तुम्हें बुरा न लगे तो... क्या मैं तुम्हें घर ड्रॉप कर दूं? बारिश फिर शुरू हो सकती है।"

मैंने हां कर दी।

उसकी कार में बैठते ही माहौल बदल गया। उसने मेरी तरफ देखा, हाथ मेरे हाथ पर रखा।

"आरुषि... पहली नजर में ही कुछ हो गया है।"

मैंने कुछ नहीं कहा, बस उसकी आंखों में देखती रही।

घर पहुंचते-पहुंचते वो मेरे घर के पास रुका।

"अंदर चलोगी थोड़ी देर?"

मैंने हां कहा। अंदर जाते ही दरवाजा बंद हुआ और वो मुझे दीवार से सटा कर किस करने लगा। उसके होंठ मेरे होंठों पर, जीभ अंदर... मैं पिघल गई।

उसने मेरी टॉप उतारी, ब्रा खोली। मेरे चुचे बाहर आए। वो उन्हें चूसने लगा – एक को मुंह में, दूसरे को हाथ से दबाता। मैं कराह रही थी –

"आह्ह... आरव... धीरे..."

लेकिन वो और जोर से चूसने लगा।

फिर वो नीचे गया। मेरी जींस उतारी, पैंटी साइड करके मेरी चूत पर जीभ फेरी। मैं सिहर गई।

"आरुषि, तेरी चूत कितनी गीली है... स्वादिष्ट है।"

वो जीभ अंदर डालकर चाटने लगा। मैंने उसके बाल पकड़ लिए –

"आह्ह... और अंदर... चाटो जोर से!"

कुछ मिनट चाटने के बाद वो उठा। अपना लंड निकाला – लंबा, मोटा, सख्त। मैंने पहली बार इतना करीब देखा। मैं घुटनों पर बैठ गई और मुंह में लिया। चूसने लगी – जीभ से चाटती, गले तक ले जाती। वो कराह रहा था –

"आरुषि... क्या कमाल चूसती हो... रंडी बन जाओ मेरी!"

फिर उसने मुझे बेड पर लिटाया। टांगें फैलाईं और अपना लंड मेरी चूत पर रगड़ा। एक झटके में पूरा अंदर।

"आआह्ह... आरव... फाड़ दो मेरी चूत!"

मैं चिल्लाई। वो जोर-जोर से धक्के मारने लगा। भच्च-भच्च की आवाज कमरे में गूंज रही थी।

मैंने कहा –

"आरव... मेरी गांड भी मारो... आज सब कुछ दो!"

वो हंसा –

"रंडी, तैयार हो?"

उसने वैसलीन लगाई, पहले उंगली से गांड खोली, फिर लंड घुसाया। दर्द हुआ लेकिन मजा दोगुना। वो चूत में उंगली डालकर और गांड में लंड से चोद रहा था।

मैं झड़ गई – तीन-चार बार। वो भी तेज हो गया और मेरी चूत में झड़ गया। गर्म वीर्य अंदर भर गया।

हम दोनों थककर लेट गए। वो बोला –

"आरुषि, ये सिर्फ शुरुआत है। अब रोज ऐसा ही होगा।"

मैं मुस्कुराई –

"हां... मैं तेरी हूं।"

उसके बाद से हम रोज मिलते हैं – कभी कॉफी शॉप में, कभी उसके घर, कभी मेरे। किताबों की बातें अब चुदाई की बातों में बदल गईं।

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आरुषि

कहानीकार

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