कॉलेज कैंटीन में नेहा की चूत फाड़ चुदाई Hindi Sex Stories
हाय दोस्तों, मैं विकास शर्मा हूं। आज मैं अपनी वो कॉलेज वाली कहानी पूरी डिटेल में सुना रहा हूं – वो कहानी जो बाहर से प्यार-दोस्ती लगती थी, लेकिन अंदर से चूत-लंड की गंदी मस्ती से भरी थी।
कॉलेज का पहला दिन था। नई जगह, नए चेहरे। मैं कैंटीन में बैठा था, चाय पी रहा था। तभी वो आई – नेहा। गोरी-चिट्टी, लंबे बाल, टाइट जींस और टॉप में उसका फिगर देखकर मेरी सांस रुक गई। 34-28-36 का परफेक्ट बॉडी, चुचे ऊपर उठे हुए, गांड गोल-मटोल। वो मेरी टेबल पर रुकी और बोली –
"Excuse me, ये सीट खाली है?"
मैंने हां में सिर हिलाया। वो बैठ गई।
पहले कुछ मिनट चुप। फिर बात शुरू हुई – क्लास, टीचर, सब्जेक्ट्स। लेकिन मेरी आंखें उसके होंठों, उसके चुचों पर टिकी रहतीं। वो भी मुझे देखकर मुस्कुराती।
धीरे-धीरे दोस्ती हुई। कैंटीन में साथ चाय, लाइब्रेरी में साथ पढ़ाई, शाम को कॉलेज गार्डन में घूमना। लेकिन मन में कुछ और चल रहा था। एक दिन कैंटीन के पीछे, जहां कोई नहीं आता, वो बोली –
"विकास... मुझे तुमसे बहुत पसंद है।"
मैंने कहा –
"नेहा... मैं भी तुझसे पागल हूं।"
उसने मेरे हाथ पकड़े। मैंने उसे दीवार से सटाया और किस कर लिया। होंठों से होंठ चिपके, जीभ अंदर। उसके चुचे मेरे सीने से दब रहे थे। मैंने टॉप ऊपर किया, ब्रा साइड की। चुचे बाहर आए – गुलाबी निप्पल सख्त। मैंने चूसना शुरू किया। वो कराह रही थी –
"आह्ह... विकास... चूसो जोर से... कितने दिनों से इंतजार था!"
फिर मैं नीचे गया। जींस की बटन खोली, पैंटी सरकाई। उसकी चूत गीली थी, झांटें साफ। मैंने जीभ लगाई। वो सिहर गई –
"आह्ह... विकास... चाटो... अंदर डालो जीभ!"
मैं जीभ अंदर डालकर चाटता रहा। क्लिट पर जीभ घुमाता, चूसता। वो मेरे बाल पकड़कर दबा रही थी –
"और जोर से... मेरी चूत फाड़ दो जीभ से!"
वो झड़ गई – पानी मुंह पर छलक गया।
फिर मैंने पैंट नीचे की। मेरा लंड खड़ा था। वो घुटनों पर बैठ गई और चूसने लगी। जीभ से सुपारे चाटती, गले तक ले जाती। मैं कराह रहा था –
"नेहा... चूस... मेरी रंडी बन जा!"
वो टट्टे चूसती रही।
फिर मैंने उसे दीवार से सटाया। टांग एक उठाई, लंड चूत पर रगड़ा। वो बोली –
"डालो विकास... मुझे अपना बना लो!"
एक झटके में पूरा अंदर।
"आआह्ह... कितना मोटा है... फाड़ रहा है!"
मैं धक्के मारने लगा। भच्च-भच्च की आवाज कैंटीन के पीछे गूंज रही थी। वो चिल्ला रही थी –
"जोर से... फाड़ दो मेरी चूत!"
मैंने चुचे दबाए, निप्पल काटे। वो दो बार झड़ गई। मैंने चूत में झड़ दिया।
उसके बाद रोज यही होता। लाइब्रेरी के पीछे छुपकर वो मेरे लंड को चूसती। मैं उसकी चूत चाटता। गार्डन में शाम को बेंच पर वो मेरी गोद में बैठकर लंड अंदर लेती।
एक बार तो गार्डन के पेड़ के पीछे उसने गांड दी। मैंने वैसलीन लगाई, धीरे से घुसाया। वो दर्द से चीखी –
"आह्ह... विकास... गांड फाड़ दो... लेकिन रुकना मत!"
मैंने पूरा घुसाया और पेला। वो चिल्ला रही थी –
"जोर से मारो... मुझे रंडी बना दो!"
मैंने गांड में झड़ दिया।
चार साल तक यही चला। कैंटीन के पीछे, लाइब्रेरी में, गार्डन में, कभी हॉस्टल की छत पर – रोज चुदाई। कभी वो मेरे लंड पर चढ़कर उछलती, कभी मैं पीछे से गांड मारता। हम दोनों झड़ते रहते।
आज हम शादीशुदा हैं। लेकिन वो कॉलेज की यादें – वो कैंटीन वाली पहली चुदाई, वो गार्डन वाली गांड माराई – हमारी सबसे प्यारी यादें हैं।
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विकास शर्मा
कहानीकार