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गांव की प्रेम कहानी से चूत-गांड की चुदाई तक Hindi Sex Stories

by रामू5 नवंबर 20248 मिनट0 views0 Comments

मेरा नाम रामू है। उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव में रहता हूं। खेती-बाड़ी करता हूं, दिनभर खेतों में गुजारता हूं। हमारी पड़ोस में गीता रहती थी। बचपन से साथ खेलते, साथ स्कूल जाते, साथ नदी किनारे घूमते। कब दोस्ती प्यार में बदल गई, पता ही नहीं चला।

गीता गोरी-चिट्टी, लंबी, चुचियां भरी हुईं, कमर पतली और गांड गोल-मटोल। जब वो साड़ी में खेतों में काम करती, तो मेरी आंखें उस पर टिक जातीं। वो भी मुझे देखकर शरमाती, मुस्कुराती। एक दिन नदी किनारे बैठे हुए उसने पूछा –

"रामू, तू मुझसे शादी करेगा?"

मेरा दिल जोर से धड़का।

"हां गीता, जरूर करूंगा। तू मेरी जान है।"

हमने हाथ पकड़ लिए। लेकिन परिवार वाले मानने को तैयार नहीं। मेरे बापू बोले –

"उसकी जात अलग है, नहीं होगा।"

गीता के घर वाले भी यही कहते।

हम दोनों चुपके-चुपके मिलते। खेतों में, नदी के पीछे। एक रात बारिश के बाद चांदनी रात थी। गीता ने कहा –

"रामू, आज घर से निकलकर खेत में मिल।"

मैं पहुंचा तो वो वहां थी – लाल साड़ी में, बाल खुले, आंखों में प्यार।

हम नदी किनारे बैठे। वो मेरे कंधे पर सिर रखकर बोली –

"रामू, मैं तुझसे बहुत प्यार करती हूं। आज सब कुछ दे दूंगी तुझे।"

मैंने उसे गले लगाया, होंठ उसके होंठों पर रख दिए। किस लंबी चली, जीभ अंदर घुसी। उसके चुचे मेरे सीने से दब रहे थे।

मैंने उसकी साड़ी खींची। ब्लाउज खोला। उसके बड़े-बड़े चुचे बाहर आए – गुलाबी निप्पल सख्त। मैंने एक को मुंह में लिया, चूसने लगा। गीता कराह रही थी –

"आह्ह... रामू... चूसो जोर से... कितने दिनों से इंतजार था।"

फिर मैं नीचे गया। उसकी पेटीकोट ऊपर की, पैंटी उतारी। उसकी चूत गीली थी, झांटें साफ। मैंने जीभ लगाई। वो सिहर गई –

"आह्ह... रामू... चाटो... अंदर डालो जीभ!"

मैं जीभ अंदर डालकर चाटता रहा। उसका रस मुंह में आ रहा था। वो मेरे बाल पकड़कर दबा रही थी।

फिर वो घुटनों पर आई। मेरी धोती खोली। मेरा लंड बाहर आया – सख्त, मोटा। वो बोली –

"वाह रामू... कितना बड़ा है... मैं चूसूंगी।"

उसने मुंह में लिया। जीभ से चाटती, गले तक ले जाती। मैं कराह रहा था –

"गीता... कमाल कर रही हो... रंडी बन गई मेरी!"

फिर मैंने उसे घास पर लिटाया। टांगें फैलाईं। अपना लंड चूत पर रगड़ा। वो बोली –

"डालो रामू... मेरी चूत तेरी है!"

एक झटके में पूरा अंदर।

"आआह्ह... दर्द हो रहा है... लेकिन मजा आ रहा है!"

वो चिल्लाई। मैं धक्के मारने लगा – तेज-तेज। भच्च-भच्च की आवाज खेत में गूंज रही थी।

गीता बोली –

"रामू... मेरी गांड भी मारो... आज सब कुछ दो!"

मैंने वैसलीन लगाई (उसने घर से लाई थी), पहले उंगली से खोला। फिर लंड गांड पर रखा। धीरे-धीरे घुसाया। दर्द से वो चीखी लेकिन बोली –

"और जोर से... फाड़ दो मेरी गांड!"

मैंने पूरा घुसाया और पेलना शुरू। चूत में उंगली डालकर, गांड में लंड से चोद रहा था।

वो झड़ गई – दो-तीन बार। चूत से पानी बह रहा था। मैंने भी जोर से धक्का मारा और चूत में झड़ गया। गर्म वीर्य अंदर भर गया।

हम दोनों थककर लेट गए। चांदनी में वो मुस्कुराई –

"रामू, ये प्यार अब हमेशा रहेगा।"

मैंने कहा –

"हां गीता, तेरी चूत-गांड मेरी है।"

उसके बाद से हम रोज मिलते। परिवार ने मना किया लेकिन हम नहीं रुके। खेतों में, नदी किनारे, चुपके से घर में – चुदाई का सिलसिला जारी है। मेरा प्यार अब सिर्फ दिल का नहीं, लंड का भी है।

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