प्रिया को पता चलने की कहानी - सास-दामाद का राज खुला, फिर क्या हुआ? पार्ट 3 - सास-दामाद अफेयर घरेलू ड्रामा Hindi Sex Stories
दोस्तों, पिछली स्टोरी में मैंने बताया था कि राज के साथ मेरी चुदाई का सिलसिला जारी था। मेरी प्रेग्नेंसी अब पाँच महीने की हो चुकी थी। पेट अब साफ दिखने लगा था—गोल, भरा हुआ। डॉक्टर ने कहा था कि सब नॉर्मल है, लेकिन ज्यादा एक्टिविटी से बचना। लेकिन राज का लंड देखते ही मेरी चूत की आग भड़क जाती। प्रिया की प्रेग्नेंसी भी चार महीने की थी, वो अब थकान महसूस करती थी, इसलिए ऑफिस कम जाती, लेकिन कभी-कभी जाती थी।
एक शाम प्रिया ने कहा, "माँ, आज ऑफिस में मीटिंग है, लेट हो सकती हूँ। तुम और राज घर पर रहना।" मैंने हाँ कहा, लेकिन मन में खुशी हुई—मौका मिल गया। राज ने भी मुस्कुराकर देखा। प्रिया निकल गई। शाम 7 बजे राज मेरे कमरे में आ गया। मैं बेड पर लेटी थी, लूज मैक्सी में। वो आया, मेरे पास लेटा, मेरे पेट पर हाथ फेरा। "माँ जी, आज बच्चा कैसा है?" बोला। मैंने कहा, "तेरा बच्चा बहुत शरारती है... जैसे तू।"
वो हँसा, मेरी मैक्सी ऊपर सरकाई। मेरी चूत पहले से गीली थी। उसने जीभ डाली, चाटने लगा। "आह... राज... धीरे... उह..." मैं सिसकार रही थी। वो लंड निकाला, धीरे से मेरी चूत में डाला। गोद में बिठाया, ऊपर-नीचे होने लगा। "आह... राज... कितना अच्छा... उह... और गहरा..." सिसकारियाँ कमरे में गूँज रही थीं। थप-थप की हल्की आवाज। वो मेरी चूचियाँ चूस रहा था, मैं उसके कंधों पर हाथ रखे मजे ले रही थी।
तभी अचानक दरवाजे की आवाज आई। प्रिया! वो लेट नहीं हुई थी, मीटिंग कैंसल हो गई थी। वो चुपके से अंदर आई, क्योंकि बाहर से आवाजें सुनाई दीं। दरवाजा खुला और वो हमें देखकर स्तब्ध रह गई। मैं राज की गोद में थी, लंड मेरी चूत में, चूचियाँ बाहर, सिसकारियाँ। प्रिया का चेहरा सफेद पड़ गया। "माँ... राज... ये क्या...?" उसकी आवाज काँप रही थी।
राज झटके से उठा, लंड बाहर निकाला। मैंने मैक्सी नीचे की, लेकिन पेट साफ दिख रहा था। प्रिया रोने लगी। "माँ, तुम... और राज? ये कैसे? मैं तुम्हारी बेटी हूँ... और राज मेरा पति!" वो चीखी। मैं घबरा गई, उठी, उसके पास गई। "प्रिया बेटा... सुन... ये... गलती हो गई..." लेकिन शब्द नहीं निकल रहे थे।
प्रिया ने राज को देखा, "तुम... तुमने मेरी माँ के साथ...?" राज चुप था, सिर झुकाए। प्रिया ने मेरा पेट देखा। "ये... ये बच्चा... राज का है न?" मैंने आँसू बहाते हुए सिर हिलाया। "हाँ बेटा... मैं... मैं तड़प रही थी... राज ने मदद की... लेकिन अब ये हो गया।"
प्रिया कुछ देर चुप रही, रोती रही। फिर बोली, "मैंने कई बार शक किया था। तुम दोनों की नजरें, राज का मेरे साथ कम टाइम... लेकिन ये...?" वो बैठ गई। राज बोला, "प्रिया... मैं गलत हूँ। लेकिन माँ जी अकेली थीं... मैंने सोचा मदद कर दूँ... लेकिन ये प्यार में बदल गया।"
प्रिया ने मुझे देखा। "माँ, तुम्हें पता था मैं भी प्रेग्नेंट हूँ। फिर भी?" मैं रो पड़ी। "बेटा... मैं कमजोर थी... तेरी माँ हूँ, लेकिन औरत भी हूँ।" प्रिया ने कुछ देर सोचा। फिर बोली, "मैं तुम दोनों से नफरत नहीं कर सकती। राज मेरा पति है, माँ मेरी माँ। लेकिन ये बच्चा... ये हमारा फैमिली का हिस्सा होगा।"
हम तीनों रोए। प्रिया ने कहा, "मैं बाहर नहीं जाऊँगी। ये घर हमारा है। लेकिन अब ये गुप्त नहीं रहेगा। हम तीनों साथ रहेंगे। बच्चे साथ बड़े होंगे।" राज ने कहा, "प्रिया... मैं तुम दोनों की इज्जत करूँगा।" मैंने प्रिया को गले लगाया। "बेटा... माफ कर दे।"
उस रात हम तीनों एक साथ बैठे बात की। प्रिया ने कहा, "माँ, अब तुम आराम करो। मैं देखभाल करूँगी। राज... तुम अब दोनों की देखभाल करोगे।" राज ने हाँ कहा।
अब घर में सब खुले में है। प्रिया और मैं दोनों प्रेग्नेंट, राज दोनों की देखभाल करता है। रातें अब अलग-अलग नहीं—कभी प्रिया के साथ, कभी मेरे साथ, लेकिन सबकी सहमति से। बच्चे आने वाले हैं—एक मेरी बेटी/बेटा, एक प्रिया का। लेकिन फैमिली अब मजबूत है।
दोस्तों, ये मेरी कहानी का अंत नहीं, बल्कि नई शुरुआत है। क्या ये सही था? क्या प्रिया का फैसला ठीक था? आप बताओ।
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रिया
कहानीकार