चाचा ने पकड़ लिया - चाची-भतीजे अफेयर का ट्रेजिक अंत गाँव से निकाला पार्ट 4 - सैड एंडिंग चाची-भतीजे अफेयर Hindi Sex Stories
दोस्तों, ये मेरी आखिरी कहानी है। मैं रोहन हूँ। आज मैं मुंबई में अकेला बैठा हूँ, लेकिन मेरी आँखों के सामने अभी भी वो रात घूम रही है—जिस रात सब कुछ खत्म हो गया। चाची राधिका के साथ पार्क में मिलना अब हमारी आदत बन चुकी थी। हर रात 10 बजे, जब गाँव सो जाता, हम पीपल के पेड़ के पीछे या घास पर मिलते। चाची स्कर्ट में आतीं, मैं लंड तैयार रखता। चूत चाटना, लंड चूसना, खड़े होकर चुदाई—रिस्क बढ़ता गया, लेकिन मजा भी दोगुना। हम सोचते थे कि कोई नहीं पकड़ेगा। लेकिन हम गलत थे।
एक रात—वो आखिरी रात—हम पार्क के बेंच पर थे। चाची मेरी गोद में बैठी थीं, स्कर्ट ऊपर, लंड चूत में। वो ऊपर-नीचे हो रही थीं, सिसकारियाँ दबा रही थीं। "आह्ह... रोहन... आज और जोर से... चाची की चूत फाड़ दे..." मैं नीचे से धक्के मार रहा था, स्तन दबा रहा था। चाँद की रोशनी में उनका चेहरा चमक रहा था। हम झड़ने वाले थे। तभी अचानक दूर से कदमों की आवाज आई। चाची ने मेरे मुँह पर हाथ रख दिया। "रुक... कोई आ रहा है..."
लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। चाचा! वो रात को ही वापस आ गए थे। घर से निकले थे, क्योंकि चाची को ढूँढ रहे थे। पार्क के पास आकर उन्होंने आवाजें सुनीं। वो सीधे हमारे पास आए। टॉर्च जलाई। रोशनी में हम दोनों—चाची मेरी गोद में, लंड अंदर, स्कर्ट ऊपर। चाचा का चेहरा पत्थर हो गया।
"ये... ये क्या हरामजादी कर रहे हो?!" चाचा की आवाज गूँजी। चाची घबरा कर नीचे उतरीं, स्कर्ट नीचे की। मैं लंड छुपाने लगा, लेकिन चाचा ने मुझे कॉलर से पकड़ लिया। "तू... मेरा भतीजा... मेरी बीवी के साथ?!" चाची रोने लगीं। "सुनो जी... ये... गलती हो गई..." लेकिन चाचा ने उन्हें थप्पड़ मारा। "गलती? सालों से कर रही हो ये गलती?!"
चाचा ने हमें घर खींचकर ले गए। घर में सब सो रहे थे, लेकिन चाचा ने आवाजें लगाईं। मम्मी-पापा जाग गए। चाचा ने सबके सामने बताया। "देखो तुम्हारा बेटा क्या कर रहा है! मेरी बीवी के साथ पार्क में चुदाई!" मम्मी चीखीं, पापा सिर पकड़कर बैठ गए। चाची रो रही थीं। मैं सिर झुकाए खड़ा था।
चाचा का गुस्सा आसमान छू रहा था। उन्होंने चाची को कमरे में ले जाकर दरवाजा बंद किया। फिर मुझे भी अंदर खींचा। "तुम दोनों ने मेरा घर बर्बाद किया। अब सजा मिलेगी।" चाचा ने चाची को बिस्तर पर पटका। साड़ी फाड़ दी। चाची रो रही थीं। "जी... माफ कर दो..." लेकिन चाचा ने नहीं सुना। उन्होंने अपनी पैंट उतारी। लंड खड़ा था—गुस्से में। चाची को घुटनों पर बैठाया, लंड मुँह में ठूँसा। "चूस... जैसे रोहन का चूसती थी!"
फिर चाची को पलटा, घोड़ी बनाया। पीछे से लंड गांड में डाला। चाची चीखीं, "आआह्ह... दर्द हो रहा है... माफ कर दो..." चाचा ने जोर-जोर से गांड मारी। "ये सजा है तेरी हरामजादी की!" चाची रो रही थीं, लेकिन चाचा रुके नहीं। गांड में झड़ गए।
फिर मेरी बारी। चाचा ने मुझे पकड़ा। "अब तू भी ले।" उन्होंने मुझे घोड़ी बनाया। लंड मेरी गांड पर रखा। मैं चीखा, "चाचा... नहीं... दर्द होगा..." लेकिन चाचा ने धक्का मारा। गांड फट गई। "आआआह्ह... मार डाला..." मैं रो पड़ा। चाचा ने जोर-जोर से गांड मारी। "ये तेरी सजा है! मेरी बीवी को छुआ!" मैं दर्द से चीखता रहा। चाचा ने गांड में झड़ दिया।
फिर चाचा ने मुझे उठाया। "अब निकल यहाँ से। ये गाँव छोड़। दोबारा कभी मत आना। अगर आया तो मार डालूँगा।" मम्मी-पापा रो रहे थे, लेकिन कुछ नहीं बोले। चाची फर्श पर पड़ी रो रही थीं। मैं कपड़े पहने, बैग उठाया और रात के अंधेरे में गाँव छोड़ दिया।
आज मैं मुंबई में अकेला हूँ। नौकरी करता हूँ, लेकिन रातें सूनी हैं। चाची की याद आती है—उनकी चूत, सिसकारियाँ, वो पार्क की रातें। लेकिन अब सब खत्म। चाचा ने सब बर्बाद कर दिया। मैं कभी गाँव नहीं लौटा। चाची से कभी बात नहीं हुई। शायद वो भी अब दुखी हैं।
दोस्तों, ये मेरी कहानी का अंत था। प्यार था, वासना थी, लेकिन गाँव के रिवाज और गुस्सा सब कुछ छीन ले गया। कभी-कभी सोचता हूँ—काश वो रातें कभी न हुईं होतीं। लेकिन जो हो गया, सो हो गया।
अब मैं बस जी रहा हूँ।
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रोहन
कहानीकार