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गाँव के पार्क में छुपी मुलाकात - चाची राधिका के साथ खुली चुदाई का रोमांच पार्ट 3 - चाची-भतीजे अफेयर आउटडोर चुदाई Hindi Sex Stories

by रोहन18 अप्रैल 20257 मिनट0 views0 Comments

पहली दो-तीन रातों के बाद कमरे में मिलना रिस्की लगने लगा। चाचा कभी अचानक वापस आ सकते थे, या कोई घरवाला जाग सकता था। चाची ने एक शाम पार्क में बैठकर कान में फुसफुसाया, "रोहन, अब कमरे में नहीं। रात 10 बजे पार्क के पीछे वाले पुराने पीपल के पेड़ के पास आ जाना। वहाँ कोई नहीं आता। चाची तेरे लिए स्कर्ट पहनकर आएगी।"

मेरा दिल धड़क उठा। रात 10 बजे घर से चुपके निकला। गाँव में सन्नाटा था, सिर्फ कुत्तों की भौंकने की आवाज दूर से। पार्क के पीछे वाला हिस्सा अंधेरा, सिर्फ चाँद की रोशनी। चाची पहले से वहाँ थीं—एक लंबी स्कर्ट और टाइट टॉप में। बाल खुले, होंठों पर हल्की स्माइल। जैसे ही मैं पास पहुँचा, उन्होंने मुझे पेड़ के पीछे खींच लिया।

"आ गया मेरा शरारती?" वो फुसफुसाईं और मुझे दीवार से सटा दिया। होंठ चूमने लगीं। जीभ अंदर। मैंने उनके टॉप के नीचे हाथ डाला। ब्रा नहीं थी। स्तन बाहर। मैंने दबाए, निप्पल चूसे। "आह्ह... रोहन... धीरे... आवाज न हो..." वो सिसकार रही थीं।

चाची ने स्कर्ट ऊपर की। अंदर कोई पैंटी नहीं। चूत पहले से गीली। मैं घुटनों पर बैठ गया। चूत पर जीभ फेरी। चाची ने मेरे सिर को दबाया। "ऊऊह्ह... चाट... जीभ अंदर डाल..." मैंने जीभ डाली, भगनासा चूसा। चूत से पानी निकलने लगा। मैं सब चाटता रहा। चाची की टाँगें काँप रही थीं। "आह्ह... रोहन... और जोर से... चाची झड़ने वाली है..."

झटके से चाची झड़ीं। उनका रस मेरे मुँह में। वो थर-थर काँप रही थीं। फिर उन्होंने मुझे खड़ा किया। मेरी पैंट खोली। लंड बाहर—सख्त, फड़फड़ा रहा। चाची घुटनों पर बैठ गईं। लंड मुँह में लिया। तेज-तेज चूसने लगीं। जीभ टॉप पर। "ऊम्म... कितना स्वादिष्ट... चाची को पसंद है..." मैंने उनके बाल पकड़े, हल्के से मुँह में धक्का दिया। वो गले तक ले रही थीं।

फिर चाची उठीं। स्कर्ट कमर तक ऊपर की। पीठ पेड़ से सटाई। एक टाँग मेरी कमर पर रख दी। "आजा... खड़े होकर चोद... चाची की चूत तेरी है..." मैंने लंड चूत पर रखा। एक धक्का—पूरा अंदर। "आआह्ह... हाय... कितना गहरा..." चाची चीखीं, लेकिन आवाज दबाई। मैंने धक्के मारने शुरू किए। "थप-थप" हल्की आवाज। चाची की गांड पेड़ से टकरा रही थी। मैंने स्तन दबाए, होंठ चूसे।

"हाँ... रोहन... जोर से... फाड़ दे चूत..." वो फुसफुसा रही थीं। मैंने रफ्तार बढ़ाई। चूत टाइट, गीली। हर धक्के पर सिसकारी। चाची ने अपनी टाँग और ऊपर की। गहरा धक्का। "आह्ह... झड़ रही हूँ..." वो फिर झड़ीं। चूत सिकुड़ी। मैं भी रुक नहीं पाया। "चाची... मैं भी..." और चूत में झड़ गया। गर्म रस अंदर।

हम दोनों साँसें लेते लेटे रहे पेड़ के नीचे। चाची ने मेरे लंड को सहलाया। बोलीं, "कल फिर यहीं। अब चाची को पार्क में चोदने का मजा आ गया।" मैंने हाँ कहा।

उसके बाद कई रातें पार्क में। कभी पेड़ के पीछे खड़े होकर, कभी घास पर लेटकर। चाची और खुल गईं—कभी स्कर्ट में बिना पैंटी के आतीं, कभी मुझे लंड चूसने को कहतीं। गाँव की रातें अब हमारी थीं।

दोस्तों, ये सीक्वल कैसा लगा? पार्क वाली रिस्की चुदाई का मजा बताओ।

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